Sahir: Two Drops Of Rain

Sahir’s poem: Do Boonde Sawan Kii (Two drops of rain). Sahil Ludhianvi

दो बूँदे सावन की

एक सागर की सीप में टपके और मोती बन जाये

दूजी गन्दे जल में गिरकर अपन आप गवाये

किसको मुजरिम समझे कोई किसको दोष लगाये Sahil Ludhianvi

दो कलियाँ गुलशन की

एक सेहरे के बीच गुंधे और मन ही मन इतराये

एक अर्थी के भेंट चढ़े और धूलि मे मिल जाये

किसको मुजरिम समझे कोई किसको दोष लगाये Sahil Ludhianvi

दो सखियाँ बचपन की

एक सिंहासन पर बैठे और रूपमती कहलाये

दूजी अपने रूप के कारण गलियों मे बिक जाये

किसको मुजरिम समझे कोई किसको दोष लगाये Sahil Ludhianvi